भारत के लिए फ्रांस बनेगा ‘नया रूस’: मुंबई में पीएम मोदी और मैक्रों की मुलाकात आज, राफेल डील पर लगेगी मुहर?

भारत के लिए फ्रांस बनेगा ‘नया रूस’: यह केवल एक शीर्षक नहीं, बल्कि 21वीं सदी की बदलती भू-राजनीति (Geopolitics) का एक नया अध्याय है। आज, 17 फरवरी 2026 को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों मुंबई में मुलाकात कर रहे हैं, तो दुनिया की नजरें केवल एक रक्षा सौदे पर नहीं, बल्कि उस गहरी होती दोस्ती पर हैं जो फ्रांस को भारत का ‘नया रूस’ बना रही है।

भारत के लिए फ्रांस बनेगा 'नया रूस'
भारत के लिए फ्रांस बनेगा ‘नया रूस’

आइए इस ब्लॉग में विस्तार से समझते हैं कि आखिर क्यों फ्रांस भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण हो गया है और क्या आज वास्तव में उस ‘महा-सौदे’ (Mega Deal) पर मुहर लगेगी जिसका इंतजार भारतीय वायुसेना और नौसेना को वर्षों से है।

भारत-फ्रांस: एक ‘सदाबहार’ साझेदारी की ओर

दशकों तक, जब भी भारत को संकट के समय एक भरोसेमंद साथी की जरूरत होती थी, तो रूस (पूर्व में सोवियत संघ) सबसे आगे खड़ा रहता था। चाहे वह 1971 का युद्ध हो या संयुक्त राष्ट्र में वीटो का मामला। लेकिन आज की बदली हुई परिस्थितियों में फ्रांस ने वह जगह लेनी शुरू कर दी है।

क्यों कहा जा रहा है फ्रांस को ‘नया रूस’?

  1. बिना शर्त समर्थन: रूस की तरह ही फ्रांस ने भारत के आंतरिक मामलों (जैसे पोखरण परीक्षण या कश्मीर मुद्दा) पर कभी उंगली नहीं उठाई।

  2. टेक्नोलॉजी का हस्तांतरण (ToT): अमेरिका जहां तकनीक साझा करने में हिचकिचाता है, वहीं फ्रांस ‘मेक इन इंडिया’ के तहत अपनी सबसे आधुनिक तकनीक भारत को देने को तैयार है। भारत के लिए फ्रांस बनेगा ‘नया रूस’

  3. सामरिक स्वायत्तता: दोनों देश किसी गुटबाजी का हिस्सा बनने के बजाय अपनी स्वतंत्र विदेश नीति में विश्वास रखते हैं।

  4. मुंबई मुलाकात का मुख्य एजेंडा: क्या राफेल पर लगेगी मुहर?

    आज की मुलाकात में सबसे बड़ा आकर्षण राफेल (Rafale) डील है। लेकिन इस बार यह केवल 36 विमानों तक सीमित नहीं है।

    1. 114 राफेल लड़ाकू विमान (MRFA):

    भारतीय वायुसेना (IAF) को अपनी गिरती स्क्वाड्रन संख्या को संभालने के लिए 114 मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट की जरूरत है। हाल ही में रक्षा मंत्रालय ने 3.25 लाख करोड़ रुपये के इस मेगा प्रोजेक्ट को हरी झंडी दिखाई है।

    • डील का स्वरूप: योजना यह है कि 18 विमान ‘रेडी-टू-फ्लाई’ मोड में आएंगे, जबकि बाकी के 96 विमान भारत में ही बनाए जाएंगे। यह ‘मेक इन इंडिया’ के तहत अब तक का सबसे बड़ा रक्षा सौदा होगा।

    2. 26 राफेल मरीन (Rafale-M):

    भारतीय नौसेना के विमानवाहक पोत INS विक्रांत के लिए 26 राफेल मरीन विमानों की डील पहले ही अग्रिम चरण में है। आज की बैठक में इसके क्रियान्वयन और डिलीवरी शेड्यूल पर अंतिम चर्चा होने की संभावना है। भारत के लिए फ्रांस बनेगा ‘नया रूस’

  5. राफेल मेगा डील: वायुसेना की ताकत में बड़ी छलांग

  6. सिर्फ राफेल ही नहीं, ‘ब्रह्मास्त्र’ तकनीक भी है साथ

फ्रांस केवल लड़ाकू विमान नहीं बेच रहा, वह भारत को आत्मनिर्भर बनाने में मदद कर रहा है:

  • जेट इंजन निर्माण: फ्रांस की कंपनी Safran भारत के साथ मिलकर लड़ाकू विमानों के इंजन (110kN) विकसित करने पर सहमत हुई है। यह तकनीक अब तक केवल मुट्ठी भर देशों के पास है।

  • स्कॉर्पीन पनडुब्बियां: मुंबई के मझगांव डॉक में तीन और अतिरिक्त स्कॉर्पीन श्रेणी की पनडुब्बियों के निर्माण पर भी चर्चा तेज है।

  • अंतरिक्ष और एआई (AI): इस यात्रा के दौरान ‘इंडिया-फ्रांस ईयर ऑफ इनोवेशन 2026’ का उद्घाटन भी हो रहा है, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और स्पेस कॉरिडोर में नई क्रांति लाएगा। भारत के लिए फ्रांस बनेगा ‘नया रूस’

क्या बदल जाएंगे समीकरण?

रूस के साथ भारत के रिश्ते आज भी मजबूत हैं, लेकिन यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रूस से स्पेयर पार्ट्स और नई तकनीक मिलने में चुनौतियां आई हैं। ऐसे में फ्रांस एक ‘विवादास्पद मुक्त’ (Conflict-free) और ‘विश्वसनीय’ विकल्प बनकर उभरा है। भारत के लिए फ्रांस बनेगा ‘नया रूस’

फ्रांस के लिए भारत उसका सबसे बड़ा बाजार है, और भारत के लिए फ्रांस पश्चिमी दुनिया का वह प्रवेश द्वार है जो उसकी संप्रभुता का सम्मान करता है।

राफेल (MRFA) बनाम अन्य: भारत ने फ्रांस को ही क्यों चुना?

भारतीय वायुसेना के 114 लड़ाकू विमानों के टेंडर (MRFA) में दुनिया के कई दिग्गज शामिल थे, जैसे अमेरिका का F-15EX और F-21, स्वीडन का Gripen-E, और रूस का Su-35। फिर भी राफेल सबसे आगे क्यों है?

विशेषता राफेल (Rafale – France) F-15EX (USA) Gripen-E (Sweden) Su-35 (Russia)
प्रकार ओमनी-रोल (Omni-role) हैवी-ड्यूटी इंटरसेप्टर लाइट कॉम्बैट एयर सुपीरियरिटी
इंजन 2 इंजन (Safran M88) 2 इंजन (GE F110) 1 इंजन 2 इंजन
कॉम्बैट रेडियस 1,850 किमी+ 1,900 किमी 1,500 किमी 1,600 किमी
हथियार क्षमता 9.5 टन 13.6 टन 5.3 टन 8 टन
विशेषता रडार से बचना (Stealthy features) भारी बमबारी कम लागत जबरदस्त गति

राफेल के ‘घातक’ हथियार: जो इसे बनाते हैं अजय

राफेल की असली ताकत उसके पंखों के नीचे लगे हथियार और सेंसर हैं। इस डील में भारत को विशेष रूप से ‘India Specific Enhancements’ (ISE) मिलते हैं। भारत के लिए फ्रांस बनेगा ‘नया रूस’

  1. Meteor Missile: यह दुनिया की सबसे घातक ‘बियॉन्ड विजुअल रेंज’ (BVR) मिसाइल है। इसकी रेंज 150 किमी से ज्यादा है। यानी दुश्मन को दिखने से पहले ही राफेल उसे मार गिरा सकता है।

  2. SCALP Cruise Missile: यह जमीन पर मौजूद दुश्मन के बंकरों और ठिकानों को 300 किमी दूर से तबाह कर सकती है।

  3. MICA मिसाइल: हवा से हवा में मार करने वाली यह मिसाइल कम और मध्यम दूरी के लक्ष्यों के लिए अचूक है।

  4. Spectra Electronic Warfare Suite: यह राफेल का ‘सुरक्षा कवच’ है। यह दुश्मन के रडार को जाम कर देता है और आने वाली मिसाइलों को भ्रमित कर देता है। भारत के लिए फ्रांस बनेगा ‘नया रूस’

3. 114 राफेल (MRFA) डील की तकनीकी शर्तें

इस डील की सबसे खास बात इसकी ‘मेक इन इंडिया’ शर्त है, जिसे लेकर आज मोदी-मैक्रों की बैठक में चर्चा हो रही है:

  • स्वदेशी सामग्री: 114 विमानों में से 96 विमान भारत में ही बनाए जाएंगे। इसमें 50% से अधिक हिस्सा भारतीय पुर्जों का होगा।

  • इंजन तकनीक: फ्रांस की कंपनी Safran भारत के साथ मिलकर 110kN शक्ति वाला इंजन विकसित करने पर राजी हुई है। यह तकनीक भारत के अपने 5वीं पीढ़ी के विमान (AMCA) के लिए रीढ़ की हड्डी साबित होगी।

  • हथियारों का एकीकरण: भारत चाहता है कि राफेल में अपनी स्वदेशी मिसाइलें (जैसे Astra) भी फिट कर सके, जिसके लिए फ्रांस तकनीकी सहयोग देने को तैयार है। भारत के लिए फ्रांस बनेगा ‘नया रूस’

4. राफेल मरीन (Rafale-M): नौसेना के लिए क्यों जरूरी?

मुंबई में हो रही इस मुलाकात में नौसेना के लिए 26 राफेल मरीन विमानों पर भी ध्यान है।

  • INS विक्रांत की ताकत: भारत का स्वदेशी विमानवाहक पोत ‘विक्रांत’ अभी पुराने मिग-29K विमानों पर निर्भर है। राफेल मरीन के आने से समंदर में भारत की मारक क्षमता चीन की तुलना में कई गुना बढ़ जाएगी।

  • समानता का फायदा: वायुसेना और नौसेना दोनों के पास राफेल होने से विमानों के पुर्जे, ट्रेनिंग और मेंटेनेंस का खर्च काफी कम हो जाएगा।

5. भविष्य का रोडमैप: क्या यह सही निवेश है?

$3.25$ लाख करोड़ रुपये (लगभग) की यह डील भारी भरकम लग सकती है, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम हैं:

  1. चीन-पाक चुनौती: दो मोर्चों पर युद्ध की स्थिति में भारत को कम से कम 42 स्क्वाड्रन की जरूरत है, जबकि अभी केवल 30 के करीब हैं। राफेल इस कमी को तेजी से पूरा करेगा। भारत के लिए फ्रांस बनेगा ‘नया रूस’

  2. एयरोस्पेस हब: भारत में 96 विमानों का निर्माण होने से हजारों कुशल रोजगार पैदा होंगे और भारत लड़ाकू विमानों का ‘ग्लोबल एक्सपोर्ट हब’ बन सकेग

  3. रोजगार के अवसर: लाखों नए जॉब्स

    इस मेगा-डील का सबसे बड़ा लाभ भारत के इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों को होगा:

    • प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार: अनुमान है कि 96 विमानों का भारत में निर्माण और स्थानीय सप्लाई चेन के माध्यम से अगले 10 वर्षों में 50,000 से 1,00,000 तक उच्च-कुशल (High-skilled) नौकरियां पैदा होंगी।

    • डिफेंस कॉरिडोर का विकास: उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु के डिफेंस कॉरिडोर में राफेल के छोटे पुर्जे (जैसे विंग्स, फ्यूजलेज, और एवियोनिक्स) बनाने वाली एमएसएमई (MSMEs) इकाइयों की बाढ़ आएगी।

    • कौशल विकास (Skill Development): Dassault Aviation भारतीय युवाओं के लिए विशेष ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू करेगी, जिससे विमानन क्षेत्र में विश्व स्तरीय विशेषज्ञ तैयार होंगे। भारत के लिए फ्रांस बनेगा ‘नया रूस’

    • ‘मेक इन इंडिया’ 2.0: स्वदेशी तकनीक का उदय

      इस डील की शर्तों के अनुसार, भारत केवल विमान असेंबल नहीं करेगा, बल्कि तकनीक सीखेगा:

      • 60% स्वदेशी सामग्री: भारत ने लक्ष्य रखा है कि विमानों के उत्पादन के दौरान स्थानीय सामग्री का हिस्सा 30% से शुरू होकर 60% से ऊपर तक ले जाया जाएगा।

      • स्वदेशी हथियारों का एकीकरण: भारत की अपनी मिसाइलें (जैसे Astra और BrahMos-NG) राफेल में फिट की जाएंगी। इसका मतलब है कि राफेल की सफलता से भारतीय मिसाइल उद्योग को भी ग्लोबल मार्केट मिलेगा।

      • इंजन निर्माण: 110-120 kN के हाई-थ्रस्ट इंजन का साझा विकास भारत के 5वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान (AMCA) के लिए आधारशिला बनेगा, जिससे भविष्य में इंजन के लिए विदेशों पर निर्भरता खत्म हो जाएगी। भारत के लिए फ्रांस बनेगा ‘नया रूस’

      • निष्कर्ष: एक औद्योगिक क्रांति

        राफेल डील भारत के लिए ‘स्मार्ट पावर’ का प्रतीक है। यह न केवल हमारी सीमाओं को सुरक्षित करेगी, बल्कि भारत को वैश्विक एयरोस्पेस सप्लाई चेन का एक अनिवार्य हिस्सा बना देगी। यह डील साबित करती है कि भारत अब केवल एक ‘खरीदार’ नहीं, बल्कि एक ‘सह-निर्माता’ (Co-creator) बन चुका है।

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